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2050 तक दम तोड़ देगी गंगा…पाप धोने कहा जाएंगे… पढ़ें कैसे होगी विलुप्त 

2050 तक दम तोड़ देगी गंगा…पाप धोने कहा जाएंगे… पढ़ें कैसे होगी विलुप्त 

Ashoka Times…2 november 2025

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2050 तक गंगा दम तोड़ देगी और इसका सबसे बड़ा कारण होगा इंसान…जी हां ये सच है। अगर विज्ञानिकों और रिसर्चर की मानें तो गंगा नदी का “अस्तित्व” खतरे में है, क्योंकि प्रदूषण, बांध निर्माण और जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों के कारण इसका प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हो रहा है, और पानी का स्तर भी कम हो रहा है।

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एक रिपोर्ट की माने तो 2050 तक गंगा का जलस्तर बेहद कम हो जाएगा । आज की बात करें तो गंगा का लगभग 50% से ज़्यादा पानी कम हो चुका है, और इसकी कुल लंबाई में से केवल 80 किलोमीटर ही अब स्वतंत्र रूप से बह रही है। वह गंगा जो हिमालय से निकल कर बंगाल की खाड़ी तक अपना वर्चस्व जमाए हुए थी आज अपने आप को अंत की ओर धकेल रही है वही इंसान भी अपने लाभ और विकास के लिए प्रकृति की इस सबसे बड़ी देन को तबाह करने पर तुला है।

दरअसल इंसान के भीतर की अंतरात्मा गंगा की तरह ही आधी रह गई है। गंगा में स्नान तो लगाते हैं पाप भी धो लेते हैं लेकिन गंगा के अस्तित्व पर मौन खड़े हो कर उसे मरता देख रहे हैं। इंसान की अंतरात्मा इतनी कमजोर हो गई है कि उसे केवल अपना लाभ नजर आ रहा है।

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गंगा को खतरे में डालने वाले कारक…

प्रदूषण: नदी में बढ़ता प्रदूषण इसके स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।

बांध निर्माण: बांधों के निर्माण से नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा आ रही है।

जलवायु परिवर्तन: ग्लेशियरों के पिघलने और वर्षा के पैटर्न में बदलाव से नदी का जलस्तर प्रभावित हो रहा है।भूजल का अत्यधिक उपयोग: मैदानी इलाकों में भूजल का अत्यधिक दोहन भी एक कारण है।

संभावित परिणाम…

जल स्तर में कमी: 2050 तक गंगा नदी का जलस्तर काफी नीचे चला जाएगा, जिससे पीने और खेती के लिए पानी की कमी हो जाएगी। कहां जाता है की गंगा पर लगभग 30 करोड़ से अधिक लोग निर्भर करते हैं उनकी स्थिति कि तेजी के साथ बिगड़े की इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। आप समझ सकते हैं कि 140 करोड़ आबादी वाले देश में अगर 30 करोड़ लोगों की स्थिति बद से बद्तर हो जाए तो पूरी आबादी पर कितना असर और प्रभाव पड़ेगा।

पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव: गंगा डॉल्फ़िन, मछली की विशेष प्रजातियों की संख्या में भारी गिरावट आई है। जिसके कारण गंगा की जो सफाई इसके भीतर रहने वाले जलजीव किया करते थे वह भी कम होने लगी है।

जीवनरेखा का संकट….यदि जल्द ही केंद्र सरकार और विशेष तौर पर उत्तराखंड-उत्तर प्रदेश की सरकारों ने गंगा नदी के अस्तित्व को लेकर गंभीरता से काम नहीं किया तो आने वाला समय सरकारों को माफ़ नहीं करेगा।

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